पढिएं राकेश डंगायच की कलम सेः बस्सी भाजपा की गुगली से सभी कार्यकर्ता अचंभित

बस्सी। बस्सी भाजपा में काफी इंतजार व चिंतन और मंथन के बाद शायद शीर्ष नेताओं ने जो गुगली फेंकी उसे सभी कार्यकर्ता अचंभित है। ऐसा क्या था कि इस गुगली में जो टॉप बहुमूल्य बैट्समैन थे उनको दरकिनार किया गया। शायद पर्दे के पीछे चिंतन और मंथन नहीं एक प्लानिंग चल रही थी। किसी भी सत्ता दलीय राजनीति में कैबिनेट बनाकर सरकार चला सकती है लेकिन संगठन में कोई भी काबिज पद बिना अनुभव के चलाना भाजपा प्रगति की राह में उसके लिए दुर्गम कांटो का रास्ता होगा। हमें यह कतई भी नहीं भूलना चाहिए।

 

संगठन जनतंत्र में निष्क्रिय हो तो यहीं से सत्ता का द्वार खुलता है जिसमें बहुसंख्यक वर्ग, अल्पसंख्यक वर्ग और अन्य पिछड़ा वर्ग सभी मापदंड नीहित होते हैं। सबका साथ सबका विकास आदि विषय पर चिंतन और मंथन हो जाता। उसके बाद जो वेरिफिकेशन आप करते अच्छा होता ओर संगठन को मजबूती मिलती। भाजपा की स्थापना 1980-90 का दशक एक संस्कारित पूर्ण भाजपा का निर्माण हुआ। संगठन भाजपा पर धनबल व कोई व्यक्ति विशेष हावी नहीं था। बस्सी विधानसभा में स्थानीय संगठन के बूते सभी वर्गों में भाजपा ने अपनी पहचान बना ली थी। बाबूलाल शर्मा व रामराय शर्मा ने बस्सी विधानसभा को भाजपा रंगमंच में रंग दिया था उसके बाद संगठन में एक व्यक्ति विशेष का भी होना गुटिय राजनीति में प्रभाव डाल रही थी।

 

ऐसे में संगठन भाजपा के मंडलों ने बस्सी विधानसभा को चारागराह बना दिया था। इसका परिणाम आज तक बस्सी चुनावों में हम भुगत रहे हैं। अब इसी का ताजा उदाहरण युवा मोर्चा अध्यक्ष पूर्व व वर्तमान अध्यक्ष में कोई तालमेल दिखाई नहीं दे रहा है। दोनों मंडल अध्यक्ष पद पर छाए हुए हैं लेकिन डिसीजन नहीं हो रहा। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अध्यक्ष महोदय कितने निर्दयी बने हुए है। मेरा तो यही मानना है कि समय-समय पर अपने विचार प्रकट कर मंडलों में बेठै कमंडलों को सद्बुद्धि देता रहूं।

राकेश डंगायच
पूर्व बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ
पश्चिम मंडल अध्यक्ष बस्सी

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